Wednesday, May 5, 2010

स्व-रचित कविता - ‘प्रकृति की छाया’

मैं जब भी उदास होता हूँ, तेरी छाया में चैन मिलता है।
जब कहीं न सुलझ पाऊं प्रभु, तू ही मेरे मन की सुनता है।।
कहते है मानव बढ़ रहा है, विकास की अंधी दौड में।
क्या ठीक क्या गलत छोड़ इसे, भौतिकता की होड़ में।।
अपने ही हाथों अपनों को, राह में पछाड़ रहा।
आगे बढ़ते-बढ़ते पीछे, क्या हो रहा अनजान रहा।।१।।
मानव की ताल चाँद पर, अब कदम बढाया मंगल पर।
किन्तु प्रकृति के बिना रहना, नर्क हो जाएं धरती पर।।
फिर क्यूँ ढोल पीट रहा है, अपने बढ़ते कदमों से।
क्या प्रकृति से आगे निकल सकता है, अपने धुंधले कर्मो से।।२।।
यह सत्य है आज भी मानव, भ्रमण करता प्रकृति का।
चाहे समुद्र तट हो, द्वीप समूह, विचरण करता सृष्टि का।।
किन्तु कुछ सिरफिरे लोगो ने, ईश्वर से आगे सोची है।
प्रकृति का दोहन कर करके, सारी वसुन्धरा नोची है।।३।।
वन्य प्राणी हो चाहे बाज गिद्ध, लुप्त होते जा रहे।
जोहड़, कूप, ताल, तलैया, ढूंढे से भी नहीं पा रहे।।
आसमाँ से ऊँची चिमनी, बेहाल कर रही मानव को।
गन्दे नाले-कारखाने, दूषित करते गंगा जल को।।४।।
अब तो सद्बुधि दे दो भगवन, मैं बढ चलूं सत्य की खोज में।
मोह-माया, लोभ-क्रोध छोड इसे, दुलार पाऊँ तेरी गोद में।।
प्रकृति का मैं शोषक नहीं , पोषक बन आभार दूँ।
सच्ची शान्ति,आनन्दपथ पर, जग को संग ले आगे बढूं।।५।।

Tuesday, March 2, 2010

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आज मैं मीटिंग में श्रीश के साथ वहाँ हमने doctor bansal